Friday, December 12, 2014

“Be a part of Bal Bhavan team”

                         // कला जीवनस्य सौंदर्यम //
“Be a part of Bal Bhavan team”






Respected Madam / Sir ………………


Bal Bhavan a creativity resource centre for children, in the age group of 5 – 16 years,  and here they pursue a myriad of activities like Creative Art, Creative Performance, Science Activities, Photography, Literary Activities, Integrated Activities (including traditional folk arts), Physical education (Indoor & Outdoor Games), Museum Techniques, Home Management etc. It also runs a training centre for teachers & teacher trainees.
We are looking out for people who hold welfare of children and their overall development close to their heart and wish to render voluntary service for this noble cause and contribute in reaching out with Bal Bhavan activities to a larger section of society. If you are such a person and willing to be a part of Bal Bhavan team, you are invited to apply for the same in
the attached form and e-mail to :- balbhavanjbp@gmail.com or girishbillore@gmail.com


FORM
1. Name
2. D.O.B.
3. Academic Qualification
4. Address of correspondence and Phone Number.
.........................................................................................................................................
......................................................................................................................................
5. Additional Qualification (if any) in the field of Visual Arts/ Performing Arts/ Creative- Writing, Teacher Training, teaching, Scientific activities, Physical Education, Home Management etc.
6. If pursued any creative activities in college/school level indicate the same and attach
relevant certificates (if any)
7. Present Status
i) Student (School)
ii) College Student
iii) Retired Officer
iv) Any other ..........
8. My contribution as a Volunteer would be { 250 aprox }
9. How many hours and how frequently you can associate with Bal Bhavan activities?

 { 250 aprox }

Saturday, September 27, 2014

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा रोकने हुआ सीधा संवाद

संभागायुक्त श्री दीपक खांडेकरआई.जी. महिला सेल श्रीमति प्रग्यारिचा श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में महिला सशक्तिकरण विभाग एवम पुलिस विभाग के संयुक्त तत्वावधान में  “सीधा :संवादकार्यक्रम का आयोजन किया गया . दो सोपान में आयोजित  इस कार्यक्रम में बोलते हुए संभागीय आयुक्त श्री  दीपक खांडेकर ने कहा –“ दिन प्रतिदिन विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं कीभागीदारी बढ़ रही है ।  ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि जहां पर महिलाएं जा रही हैं  काम कर रही हैंवे स्थल चाहे शासकीय हों अथवा अशासकीय हों या निजी होंकार्य करने की दृष्टि से पूरी तरह सुरक्षित हों,जिससे महिलाएं बिना किसी झिझक के कार्य कर सकें या कार्य करवा सकें । उनमें असुरक्षा की भावना नरहे ।  किसी भी प्रकार से उनका लैंगिक उत्पीड़न न हो । महिलाओं के कार्य करने के स्थल सुरक्षित औरसुविधाजनक हो । यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो समानता की बात करना बेमानी होगी ।  देश की संसद ने इसके लिए वर्ष 2013 में कार्य स्थल पर सुरक्षा को लेकर लैंगिक उत्पीड़न निवारणप्रतिषेध एवं प्रतितोषणअधिनियम बनाया है । इस अधिनियम में महिलाओं की सुरक्षा के संबंध में विभिन्न प्रावधान किए गए हैं।  कार्यालय या किसी भी कार्य स्थल पर कार्यालय या संस्था प्रमुख की जवाबदेही होगी कि कार्य स्थल परसुरक्षित कार्य का वातावरण उपलब्ध करायें । कार्य स्थल के लोगों को इसके प्रति जागरूक बनाया जाये । अपने कार्यालय में एक समिति गठित करें जो इस प्रकार के मामलों की मानीटरिंग करे और कार्यवाही करे। कार्यशाला में पुलिस महानिरीक्षक डी. श्रीनिवास राव ने कहा कि कार्य स्थल पर महिलाओं के लैंगिक उत्पीड़न रोकने के लिए बनाये गये अधिनियम में जो प्रावधान किए गए हैं उनका सभी संभागीयएवं जिलों के कार्यालयों में पालन हो ।  महिलाओं के लिए कार्य स्थल पर एक सुरक्षित वातावरण दिया जाए ।  जिससे वे गरिमा और सम्मान के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें ।  उनके अंदर कभी भीअसुरक्षा की भावना न आए । यदि कोई कर्मचारी या सहकर्मी प्रावधानों का उल्लंघन करता है तो उसके विरूद्ध सख्त कार्यवाही हो ।
पुलिस महानिरीक्षक (महिला अपराध) श्रीमती प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव ने कहा –“समाज की 50% प्रतिशत आबादी महिलाओं की है ।  इस आधी आबादी को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना होगा । सुरक्षित वातावरण में ही समाज के निर्माण में यह अपना योगदान दे पायेगी । यदि हम वास्तव में चाहते हैंकि महिलाएं आगे आयें तो उन्हें कार्य स्थल पर बेहतर वातावरण मुहैया कराना होगा । कार्यशाला में अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों पर प्रकाश डाला गया ।
लैंगिक उत्पीड़न में शारीरिक सम्पर्कलैंगिक स्वीकृति के लिए कोई मांग या अनुरोधलैंगिक  टिप्पणी करनाअश्लील साहित्य दिखानालैंगिक प्रकृति का कोई अन्य निंदनीयशारीरिकशाब्दिक या गैरशाब्दिक आचरण करना शामिल है ।  इसी प्रकार कार्य स्थल की व्याख्या इस प्रकार बताई गई – ऐसा कोई विभाग,संगठन उपक्रमस्थापनउद्यमसंस्थाकार्यालयशाखा या यूनिटगैर सरकारी संगठनकोई प्राइवेट सेक्टरसोसाइटीन्यासअस्पतालप्रशिक्षणकोई खेलकूद संस्थानकोई निवास गृह या कोईअन्य गृह । नियोजन से आशय है उसके प्रक्रम के दौरान कर्मचारी द्वारा भ्रमण किया गया कोई स्थान एवंउपलब्ध कराया गया परिवहन भी है ।
कार्यशाला के द्वितीय सोपान में टाक शो का समावेश बेहद प्रभावी रहा जिसमें श्री अमृतलाल वेगड, श्री रवींद्र बाजपेई, महिला मुद्दों पर विशेषरूप से आदिवासी दलित महिलाओं के लिये कार्य करने वाली  सामाजिक कार्यकर्ता दया मां (हर्रई) , श्री मनीष दत्त, श्रीमति उपमा राय, फ़िलम अभिनेता श्री आशुतोष राणामनोवैज्ञानिक श्रीमती जैन(सागर), अपराध शास्त्र विशेषज्ञ राजू टंडन,स्त्री रोग विशेषज्ञ डा.रूपलेखा चौहान ने तीन पीढियों से सीधा संवाद किया. युवा, प्रौढ़, वयोवृद्ध जनों से हुई बातचीत में अंतत: एक सारभूत तत्व सामने आया कि "महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते जा रहे संत्राष का मूल आधार समकालीन  सामजिक परिस्थितियां हैं. ज़रूरत है आत्मअंवेषण की"
  सिने कलाकर आशुतोष राणा ने अपने वक्तव्य एवम पूछे गये सवालों के ज़वाब आद्यात्मिक आधार पर दिये, जबकि अमृतलाल वेगड़ ने नारी के सशक्त स्वरूप की व्याख्या करते हुए रोचक शैली में कहा कि- "समकालीन परिस्थियां तुरंत वैचारिक रूप से संवेदित  होने एवं आत्मचिंतन करने के लिये प्रेरित कर रहीं हैं.. "
   वरिष्ट पत्रकार श्री रवींद्र वाजपेई ने सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण से महिलाओं के विरुद्ध हो रही हिंसा लैंगिक अपराधों को रोकने का कारगर एवं प्रभावी तरीक़ा निरूपित किया. 
   दया मां ने महिलाओं को उनके अधिकारों मौज़ूदा क़ानूनों की जानकारी मुहैया कराने पर बल दिया. 
डा. रूपलेखा चौहान ने कहा कि- "सामाजिक सोच में परिवर्तन लाए बिना न तो भ्रूण हत्याएं रोकी जा सकेंगी और न ही महिलाओं के खिलाफ़ होती घटनाओं को रोका जा सकता है"  
     एड. मनीष दत्त ने मौज़ूदा कानूनों का ज़िक्र करते हुए महिलाओं को स्वयं तत्परता के लिये प्रेरित किया.   

       इस अवसर पर श्री मनु श्रीवास्तव, सी एम डी विद्युत-वितरण कम्पनी,  पुलिस महक़मे के अधिकारी गण,  संयुक्त-संचालक महिला बाल विकास श्री हरिकृष्ण शर्मा, संभागीय उपसंचालक महिला सशक्तिकरण  श्रीमति शालिनी तिवारी सहित  जिला महिला सशक्तिकरण अधिकारी, संरक्षण अधिकारीयों एवं  संभाग के विभिन्न जिलों से आए स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि , विभिन्न विभागों के अधिकारीगण, महिलाओं के लिये कार्य करने वाले विचारक एवं एक्टिविष्ट, मीडिया से जुड़े प्रतिनिधि, किशोर बालक बालिकाएं,  वयो वृद्ध जन विषेश रूप से आमंत्रित थे


Thursday, August 21, 2014

स्नेह शिविर सीहोर Part 1



एकीकृत बाल विकास सेवा मध्य-प्रदेश द्वारा चलाए गए अभिनव प्रयासों की सर्वत्र सराहना की जा रही है.  यह वीडियो डाक्यूमेंट्री फ़िल्म  इस बात की पुष्टी करती है. डाक्यूमेंट्री के दूसरे भाग को देखने के लिये यहां क्लिक कीजिये
 स्नेह शिविर सीहोर  Part 2
अथवा इसे खोज बार में कापी पेस्ट कीजिये
=> https://www.youtube.com/watch?v=4HeXSwlKJBc

Tuesday, June 17, 2014

अपने-अपने दिवस...

मित्रो अपने यहाँ पूरे वर्ष भर उत्सव मना ने की सनातनी परम्परा रही है और साल में जीवन -मरण मात्र को स्मरण कर इकठ्ठा होने वाले मेकाले पुत्रो ने  हमारी इस उत्सवधर्मिता की खूब हँसी उड़ाई ....हमें ना-ना प्रकार के विभुष्णो से अलंकृत किया गया   !!!!....वे  साल भर में जब -तब अमुक डे-फलं। डे मना डालते और शेष दिनों में खालिश व्यक्तिवादिता के नशे  में" डे आयोजन" के संज्ञा-सर्वनाम के विशेषण को लतियाते रहते....?????
     लतभनजन की धुन में उन्हें हमारी दिन- प्रतिदिन की गम्मत से भारी चिड होती थी और अपनी  इस झेप को मिटाने के लिए उन्होंने कुछ तथाकथित प्रेरणादायी दिवसों को इजाद कर डाला......वेलेंटाआईं न डे ,मदर डे .....आदि -आदि ....गोया कि  एक दिन दुकान  लगाओ ...बेचो ...खाओ और अगले दिन दूसरा शिकार देखो .....???...इन गोरो ने दुनिया भर की प्राकर्तिक संपदा  को जी भर लूटा और तथाकथित  विकसित कंट्री की स्यंभू डिग्री तानकर शेष दुनिया को विकाशशील बनाए रखने के ब्रांहणवाद के चलते पर्यावरण संरक्षण की दुहाई शुरू कर दी ....!!!!...दुहाई भी ऐसी कि ...हज करती बिल्ली भी शरमा जाये ....सो एक पर्यावरण दिवस को ईजाद  करके ...दिन भर.. ग्रीन हाउस का ठीकरा गरीबो पर फोड़कर साल भर की एनओसी अपने पाकिट मे रखने का वन डे टूर्नामेंट चालू आहे ....!!!...मित्रो ऐसी ही दुर्गति भाई लोग ....वृद्धाश्रम खोलकर फादर की करते आ रहे थे ...सो  ...लगे हाथ फादर डे का तम्बू भी उसी 
पर्यावरण दिवस को तान दिया ...!!!...प्रकति रूपी माँ और फादर का एसा विकट मट्टीप्लीती मिला जुला  संस्करन ...इनही मायावियों की देन है !!   
        इन मायावियों के चमत्कार को अपने यहा भी  सुधिजन खूब नमस्कार करने मे जूटे रहे ....पर सुधिजन इस  घनचक्कर मे ये भूल गए कि...हमारी तिरकाल संध्या मे तो देव स्वरूप मात -पिता का दिन -प्रति दिन का सुमरण पूर्वजो के काल से होता आ रहा है ....!!!...हम अपनी  चाल भूलकर ...एक ही दिन मे पर्यावरण रूपी   माँ और फादर यानि पिता को स्मरण करने के  स्वांग मे 364 दिन ही  नहीं   बल्कि पूरी सनातनी गौरव गाथा का बंटाढार करने पर क्यो उत्तारू है .....????












                                                                                                                                                   

Wednesday, December 18, 2013

साल तेरा -मेरा

साल तेरा……  भई  छुट्टी की बेरा……  बुंदेली  मस्ती में ये गुनगुनाहट……  कुछ को भनभनाहट लग रही होगी ??? …… पर गुनगुनाहट और भनभनाहट दोनों में ....... जिन्हे हम   भूलना चाहे वो अक्सर याद आते है…… का तराना .......  बढ़ती ठण्ड में गर्माहट घोल रहा है !!!…भला लगातार ६ सीरीज जीतने की  गुनगुनाहट  को केसे रोकेंगे यह दीगर है कि  जाते -जाते परदेश में बढ़िया  सलामी हो रही है …!!!....  आपको अपनी जीत  की गुनगुनाहट का पूरा हक़ है भले ही आखिर  में उनके  जोक बन  रहे हैं …… !!!… निर्भयता की गुनगुनाहट को जाते-जाते कितनो ने हल्का कर दिया....   हल्केपन की दरारे  चौखाम्भो  से भनभना  रही है ???  तोता -मेना की कहानी के कितने फ़साने हुए पर हमारी बिल्ली के हमी से मियाऊ का अफसाना  भूले से भी नहीं भूलता…   !!!                                                                                                                                                          भूल -भुलैया के  दीदारे  आम  में  सूबाई खदबदाहट को कौन भूलेगा…भूलना तो दूर अगले साल की धुप्पल में सब एक दूसरे   की  धुलाई  का दावा थोक रहे है. …धुलाई  कोई खेल नहीं धुलना भी एक कला है  इसे  भी हमने  खेलो  में जाना ???…और हां विदेशी एयरपोर्टो पर   इस  धुलाई का कोई असर नहीं  उनकी तलाशी  की गंदगी कोई याद नहीं करना चाहेगा पर अभी जो अकड़ हम दिखा रहे है उसकी कायमी पर गुनगुनाहट टिकी है ।                                                                                                                                                     इस गुनगुनाहट में २००से ३०० करोड़ी बनने की गर्माहट बॉक्स ऑफिस में दिखी तो धोखाधड़ी के असल किस्से भी बम्बइया पुत्त रो को कोर्ट खींच लाये !!!आतंक के साये की भनभनाहट का विकृत रूप दरभा से लेकर एलओ सी तक दुश्मनी बरपाता रहा ?? ……  समय बड़ा वलवान है.…… सो साल तेरा को भी कहना पड़ेगा…  मेने देखा -तुमने देखा -सबने देखा एक दुश्मन जो दोस्तों से भी प्यारा है…!!!

Saturday, June 8, 2013

मिक्सिंग-मिक्सिंग

  शाम के धुधंल्के में  रेस टीम करते बच्चों के धमाचौकडी के बीच अचानक मिक्सिंग-मिक्सिंग की  आवाजों से गली में   शोर  मच गया ...!!!...संडे  फिल्म के डिश.. टर्ब से अपना एंटीना भी घूमा..???..आखिर टीवी के एकाधिकार से सुनी हो चुकी गलियों में शोर कैसे ..???..बच्चों के गलियों में खेलने की ब्रेकिंग न्यूज़ बनने की आशंका और उस पर खबरियो की मुहल्ले खरोंचने की जबरिया कुश्ती के डर को भांप कर कुडकुडाते हुए बाहर भागा.....तू संत है ...तू सिंग है ..तू चंडाल है .....इतने सारे श्रीमुखो के मंगलाचरण के राज जाने बिना वापिस ब्लाकबस्टर दर्शन मुश्किल था ...सो उनकेबीच कूद पड़ा...|                                                                        
                                                                बन्दर कूदनी के बीच कुछ सियाने बच्चे मेरे कुछ पूछने के पहले ही फुदकने लगे ..अँकल-अँकल ये देखिये ..उसकी दाम थी ..लेकिन वो दोनों मिलकर हमें ही पदा रहे है ....वो पहले ही बता देता है की हम कहा छुपे है .....ये तो रोंटियाई है....चोट्टीआई  है ...??? मेने कहा भैऊ कोन सी बोली है ...??? ..अरे आप समझे नहीं ..अकेले क्रिकेट में नहीं ..यहाँ भी खेल होता  है ....???.. मैं  घबराने लगा इस बचपने को लेकर चैनल लाइव प्रसारण कर कही बच्चो के मुख में क्रिकितिया फिक्सिंग को रेस टीम न जोड़ दे और प्राइमटाइम के खेवनहार बालमन  की चंचलता को लेकर फिक्सिंग की जायजिता को न टटोलने लगे ...!!!!
                                                                               इधर मुझे कबाव में हड्डी की तरह टटोलते हुए मन के सच्चे बच्चे सुरु हो लिए ...अंकल ..अब  आप ही बताईये हम उधम न करे तो क्या करे ...???... बाप दादाओ के खेल वैसे ही हमारी गलियों से  विदा ले चुके है ..हमे स्पोंसर करना तो दूर उलटे ट्युशन -होमवर्क के नाम  पर हडकाते है ... कोई गिल्ली डंडा तक नहीं देता ...हमारे प्रशारण अधिकारों  की   बोली  मम्मी -पापा की टेर के रूप में दिखती है ...हमें रुपया -धेला नहीं ..बचपन चाहिए ...आप ने टांग क्यों मारी हम अपनी मिक्सिंग सुलटा लेंगे ...ये फिक्सिनिंग नहीं जो भाई लोगो के बिना न सुलझे,,,,???                                                                
                                      आखिरकार   बच्चो ने       फिक्सिंग और मिक्सिंग के  मायने समझा दिए थे ..एक में पैसा है तो दूसरे में बचपन है ..एक में ठगी है तो दूसरे में माखन चोरी है ...एक में डंडा है तो दूसरे में फंडा है ..एक में अय्याशी है तो दूसरे में गृहस्थी  है ..एक में डान है तो दूसरे में सुदामा है ..एक में अंडरवर्ल्ड है तो दूसरे में भारत है ...!!!...भाया ..गिल्ली डंडे ...कबड्डी ....रेस टीम ..खो-खो ..की  रोन्टइयाई  की निश्चलता में ही भारत है और किरकिटिया फिक्सिंग में इंडिया है ....!!!!   तय आपको ही करना है       बच्चो को  फिक्सिंग -फिक्सिंग  सिखाएं;;;;या मिक्सिंग-मिक्सिंग खेलने दें;;;;;;;;;;;;????

Tuesday, May 28, 2013

दरभा - दर्भ और डर के दंश

                      आज सब तरफ दरभा घाटी के  नक्सली तांडव की चर्चा हो रही है ..!!! इस चर्चा में कुछ फेसबुकिये  तो अपने आपको अराजकतावादियों से भी बड़ा जुगालीवादी सिद्ध करने के लिए हिंसा की निंदा की ऊपरी लाइन डालने के बाद  अंदरखाने में प्रकारांतर नक्सली आतंक को महिमामंडित करने जुटे है ???...
        इनमे से बहुतेरो  ने तो बस्तर देखा ही नही  और लालकिताब की तोता रटंत शुरू कर दी है  .....!!!! 
            कितनो ने गंगालूर की बेबसी ,पुश्नर की तड़फ , दरभाघाटी के एन ऊपर एलाग्नार की उजाड़ चोटी  एपदेड़ा की भूख, तोकापाल की वेचेनी कुटरू की वीरानगी उसूर के बाजार भोपाल पटनम की त्रिराज्यीय सीमाएं छिंदगढ़ जैसे अनेक दण्डकारण्य के भू-भागों को देखा जाना है ?
       दण्डकारण्य के ऐसे अनेक जाने पहचाने भूले विसरे क्षेत्रों को देखे परखे बगैर आप कैसे लाल किताब के जोर पर कहते है कि - खूनी आंतक के बीच आदिवासियों के खून का उबाल है, नक्सली आंतकबाद में आदिवासी जिंदाबाद है, लाल सलाम की दहाड़ में पूंजीवादियों की पछाड़ है, नक्सली दलम बस्तर से खनन-वन माफिया का तोड़ है, सलवा जूड़ुम आदिवासी शोषण का निचैड़ है, दादा लोगों की दादागिरी भ्रष्ट तंत्र को काबू में करने का औजार है, लोकतंत्र एक दिखावा है, पंचायती राज एवं चुनावों का वायकाट शोषण की काट है, जनप्रतिनिधियों का खून पानी है, सुरक्षाकर्मियों की शहादत बेमानी है........ इत्यादि.......। यह चतुर सुजान यह कहते भी नहीं थकते कि पहले रोटी नहीं दी गई इसलिए अब गोली दी जा रही है ............ गोया आपने बच्चे को भूखा रखा तो हम खून पिलायंगे ......... विकास नहीं हुआ तो विनाश हो रहा है !
                                       अब लाख टके  का सवाल यह है कि इन आतंकियों ने लाल खाल ओढ़ कर कौन सा स्वर्ग रच दिया है और कौन सा संसार रचना चाहते है ? ये नारे लगाते  है कि प्रजातन्त्र एक धोखा है और उनकी दुनिया ही वंचितों को न्याय दिला सकती है .......  अब आइये  जरा इनकी दुनियां के सच को जाने अबूझ माड़ में अघोषित तौर  पर इनका वर्चस्व है तो वहां के आदिवासियो को इनकी हम्माली के अलावा कुछ भी नहीं मिला ... वो आज भी मुलभूत सुविधाओ से वंचित है ? ये माओ दूत उन्हें शिक्षा के नाम पर सिर्फ गुरिल्ला  युद्ध की दीक्षा देते है ......... खुद मिनरल वाटर पीते  है और उन्हें आदिवासी संस्कृति के नाम पर दोयम दर्जे का जीवन जीने का उपदेश देते है ......... खुद टिपटॉप वर्दी पहनते है और उन्हें लंगोटी पर छोड़े  है  ?सर्वहारा की खुशहाली की बात करते है और अंचलो में रोड सहित दुसरे निर्माण कार्यो को रोकते है जैसा ये कहते है की लगभग देश के 2OO  जिलों में इनकी तूती बोलती है तो भैया इन इलाकों में स्कूल क्यों सूने है ? यहाँ के विकास विभागों के अधिकारी कर्मचारी डर  के मारे फिल्ड में न जाकर बजट को ऑफिस से ही खर्च कर रहे है ...... उन्हें क्यों नहीं सुरक्षा की गारंटी देकर आम आदिवासी से जोड़ते है आपने खूब फारेस्ट पुलिस के अमलो को मारा पर विकाश कार्यो से जुड़े कितनो पर हाथ उठाया जबकि आपके ही मुताबिक सरकारी एजेंसिया विकाश नहीं कर रही है मतलब साफ है आपकी तूती   के बाद भी आप न तो आदिवासियो का विकास कर रहे है और न ही विकास एजेंसियों से काम करा रहे है बल्कि उनसे जजिया वसूल कर मुटिया  रहे है ?
          तो इनकी जजिया वसूली वदस्‍तुर खनिज -वन -ट्रांसपोर्ट दारू कंपनियों  के साथ -साथ नेताओ से चुनाव वायकॉट पर  है 
                     न माओ के नाम पर चीन कहा से कहां  पहुंच गया .........उनकी आत्मा इन पाखन्डियो के कारनामो से रो रही होगी ....... माओ  ने ये कभी नहीं कहा था की शोषण का हस्तांतरण हो उन्होंने तो हर हालत में वंचितों के हक़ की बात कही थी......  माओ  सापनाथ से ज्यादा  नागनाथ को कुचलने के हिमायती थे.........माओ  कायरता के घोर विरोधी थे जबकि ये नक्सली इतने कायर है की लड़ाई में हमेशा भोले भाले आदिवासी महिलाओ --बच्चो को जानवरों की भांति घेर कर ढाल  बनाते है तथाकथित  जीत के बाद इन बेचारो से मुर्गा दारू पार्टी लेते है इन्ही के परिवारों में रात  गुजारते है  . 
                    हां  एक बात और ये अपनी सरपरस्ती किसी  स्थानीय  आदिवासी लीडर को न सौंप कर इसी  तथा कथि‍त शोषित सरकार द्वारा संचालित सरकारी कॉलेजों से निकले अग्रेंजी दा बेरोजगार झोलेधारी खिचडीदाडी ओढे पडोसी राज्‍यों के सिरफिरे की सरपरसती स्‍वीकारते है क्‍योंकि यह नेता देश विरोधी ताकतों द्वारा देश को चीरने के लिये लाल कोरिडोर बनाने में मुफीद दलाल होते है, जबकि स्‍थानीय आदिवासी नेता देश द्रोह की बात सपने में भी नही सोच सकता । मतलब साफ है स्‍थानीय आदिवासी लाल आंतक के लिये सिर्फ रॉ मटेरियल बनकर रह गया है।
           इनकी इसी बर्वता के चलते यह आज तक आदिवासियों के बीच रामकृष्‍ण आश्रम, व्‍यास पीठ, गायत्री परिवार, मिशनरी जैसी सेवा भावी आस्‍था पैदा नहीं कर पाये है। आखिर धुर अबूझ आदिवासी क्षेत्रों में इन्‍द्रावती के उसपार महाराष्‍ट्र के गढचिरोली जिले में बाबा आम्‍टे के आश्रम की प्राण वायु यह दुष्‍ट क्‍यों ग्रहण नही करना चाहते ? मकसद साफ है खनन - वन- शराब - परिवहन - नौकरशाही से कमीशन खोरी कर मुटियाने,  देशद्रोही ताकतो की सह पर लाल कॉरिडोर का खंजर भारत माता के सीने में चीर कर देश को अस्थिर बनाये रखना ही इनका मूल एजेण्‍डा है बरना अपने तथा कथित प्रभाव क्षेत्र में अपने तथा कथित आका माओं की तर्ज पर चायना जैसा ही सही कोई भी सफल विकास मॉडल चरित्रार्थ क्‍यों नही कर पाये ?
        
   लाल आंतक के वर्बर चेहरे के बाद अब बात आती है कि बस्‍तर क्षेत्र के आदिवासियों को विकास की मुख्‍य धारा में कैसे लाया जाये ।
ऐसा नहीं है कि दण्‍डकारण्‍य में आशा की किरण नहीं है .............. आप डिमरापाल जाइऐ वहां के आश्रम से कई सफल आदिवासी बेटियों की प्रगति गाथा मिलेगी, अबूझ माढ के निकट राम कृष्‍ण आश्रम किसी संजीवनी पर्वत से कम नही है, दंतेवाडा क्षेत्र में गायत्री परिवार के चमत्‍कृत प्रभाव मिलेगें, गीदम से आगे भेरमगढ, बीजापुर क्षेत्र में व्‍यास पीठ में स्‍थानीय आदिवासियों की आस्‍था की अभीव्‍यक्ति मिलेगी , गंगालूर क्षेत्र में मिशनरी की सक्रियता भी दिखेगी ।  बाबा आम्‍टे के आनन्‍द आश्रम की सेवा से भेरमगढ कुटरू मार्ग के दुरूह क्षेत्र में जनजातियों के बीच जीवन की आशा देखी जा सकती है
     इन भगीरथी  प्रयासों कि सफलता से स्‍पष्‍ट है कि आम आदिवासी दो पाटों के बीच में पिसना नही चाहता वरन वह तो निश्‍छल भावी विकास कार्यो का अभिलाषी है ............ निश्‍चय ही उसकी यह अभिलाषा सुसंगत स्‍वयं सेवी प्रयासों से फलीभूत होगी। इस‍लिये देश भर में सक्रिय तमाम निशस्‍त्र सेवा भावी स्‍वयं सेवी संस्‍थाओं को आगे आकर क्षेत्र के विकास में अपनी आहुती देकर आदिवासियों के खोये विश्‍वास को जाग्रत करना होगा। आर्य समाज ने देश के विकास में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है तथा महिला चेतना मंच जैसे अनेक एनजीओ राष्‍ट्र निर्माण में लगे है। स्‍वामी अग्निवेश जैसे आर्य समाजियों, वीडी शर्मा जैसे स्‍वयं सेवियों सहित विभिन्‍न क्षेत्रों के तपस्वियों को बस्‍तर को सिर्फ सरकार और नक्‍सलियों के बीच की समस्‍या न मानकर इस दिशा में सांझा प्रयास हेतु आगे आना समय की दरकार है । हां जिस प्रकार बिना बागड के उपजाउ खेती नही हो सकती उसी प्रकार बिना कडी सुरक्षा के विकास का उपयुक्‍त माहोल भी पेदा होना मुश्‍किल है। विकास की दिशा में जहां सरकार का प्रयास सबसे पहले मूलभूत सुरक्षा मुहैया कराकर प्रचलित विकास कार्यो में सक्रियता बढा कर स्‍थानिय समुदाय में भरोसा पैदा करने का हों वही स्‍थानीय स्‍तर पर आदिवासियों को नक्‍सलियों के चंगूल से बाहर आकर स्‍थानीय पंचायती राज में सह भागिता करनी होगी और इसके लिये नक्‍सलवादियों के वारताकारों एवं पेरवी कर्ताओं को हथियार बन्‍द नक्‍सलियों को भी तैयार करने के लिये प्राथमिक तौर पर आगे आना होगा क्‍योंकि बंदूक की गर्जना से विश्‍वास का माहोल कभी पेदा नही हो सकता । निश्‍चित तौर पर बंदूक की दम पर नक्‍सली आंतकवादियों को जेल से छूडाने की जिद इस प्रक्रिया में सबसे बडी बाधा है जिसे स्‍पेशल फास्‍ट ट्रेक कोर्ट के गठन से एक चरण बद्ध तरीके से समय सीमा में निराकृत किया जा सकता है ।
     इस पहल से विश्‍वास बहाली के परिणाम स्‍वरूप शांति प्रक्रिया स्‍थापित होने में समय लगेगा पर क्‍या चुनावी दौर में जनप्रतिनिधि और नक्‍सली दोनो ही इस धीरज को रख पायेगें इसी प्रश्‍न के उत्‍तर में समस्‍या का समाधान मिलेगा ......... बिन सतसंग विवेक न होई ............ की उक्ति इस समस्‍या की निराकरण की सबसे बडी जरूरत है वरना दर्भ और डर के दंस से दर्भा जैसी घटनाओं में आदिवासी , जनप्रतिनिधि, सुरक्षा बल शहीद होते र‍हेगें।

Wednesday, December 26, 2012

अथ दंड महात्म

         वैसे   तो     भय बिन प्रीत न होय गुंसाई ...सीधी ऊँगली घी नहीं निकलता ....जैसे वचनामृत  भय ..डर..दंड ..के भावार्थ का बखान सदियों से कर रहे हैं..!!!...पर समय के साथ -साथ कनबतियो के अंदाजेबयां जुदा होते जाते है ..! ..जलियांवाला बाग ,रामलीला मैदान,स्टिंग ऑपरेशन....आदि -आदि सत्य कथायें...डर की मनोहर -नूतन  व्याख्या कर रही है ...!!  ..इन मीमांसाओं के बीच  आज के युग में खबरिया चैनलो  ने पाप -न्याय-दंड की ऐसी त्रयी प्रकट कर दी कि ..न्याय शास्त्री भी ३६० डिग्री घूम गए ...समानांतर ट्रायल्स सनसनी-वारदात के अर्जुन बनकर अपनी -अपनी चिडियाओ को काना करने लगे !!!!
                                   आज के       अर्जुनों      की         इस बटेरबाजी  ने खानदानी शिकारियों के कान खड़े कर दिए ..डर के बाजार में सेंधमारी ....???? हमारी बिल्ली हमी से मियआऊ...!!! यार हमारी बात सुनो..ऐसा एक इंसान सुनो जिसने पाप न किया हो ..जो पापी न हो ...बस पेड न्यूज ..पीतपत्रकारिता ...ब्रेकिंगन्यूज..की कमजोर नब्ज के बीच जहर को जहर से मारने  के नुश्खे से स्टिंगगरो का  स्टिंग कर दिया ...!!! २ जी से दरकते फौर्थ पिलर में फूट को देखकर १०० करोड के कामियो को ऐसा दबोचा गया  कि इण्डियागेट कांड में बेचारे पट्टीचलाने में  में बुद्धू बक्से से भी आगे निकल गए ...!!!! संसद तक में इनका परमिट रद्द करने की आवाज आई ...पर मित्रों जो मजा मुर्गा बनाने में है ..वो मुर्गा काटने में कहा..जब तक चाहेंगे मुर्गा बाग देगा ....     ..... वंदे दंड महात्म ...वंदे ....?????

Saturday, July 21, 2012

जन्मदिन

                       मित्रों जन्म और जन्मदिन  को  लेकर जन्म जन्मांतर से लेकर नाना प्रकार के अफ़साने सामने आते रहे है ...आते रहेंगे ....!!!! मुर्गी पहले या अंडा जेसी पहेलियाँ नाना -नानी ..दादियों के बीच नोनिहालो के  कोतुहल का विषय बनी रही है ..!!! जन्म के साथ ही सृष्टि का सनातनी प्रताप जारी है ...गर्भाधान से पुंसवन -प्रसूति -अन्नप्राशन-जन्मदिन की लड़ी आखिरकार पंचतत्व में विलीन हो जाती है ...विलीनता में ही जीवन की विराटता छुपी है...???
                                        इस विराटता का क्या कीजे जब नश्वर संसार के नश्वर प्राणी डाऊ के खेलो पर लन्दन में तालियाँ पीटेगे...कपडे फाड़ती भीड़ के फोटू भर खीचेंगे ...पदक विजेता का एम्.एम्.इस. परोसेंगे ...बिस्तर  चटवाने का दंभ  भरेंगे....!!!!..दरसल विराटता अंतर्मन में... आत्मा की गहराई में परमात्मा के दरसन में है ....जिसे दर्शन हो गए वो अपना -पराया -तेरा- मेरा के अंतरद्वंद से ऊपर हो कर जन्म दिन का सच्चा आनंद  उठा पायेगा ...वर्ना आत्मा का बोझ जीवन को कसेला करता रहेगा ..!!!..आत्मा  को  बोझिल मत करो ..अपने मन को मत मारो ..फिर देखो जन्मदिन की ...जीवन की विराटता का सच्चा दरसन ....!!!!..दर्शन का साहस कर पाएँगे,,???
                                              

Monday, July 9, 2012

अंतरात्मा-परमात्मा

किसी बुजुर्ग ने सही फरमाया है कि झगड़े -झांसे से बचाने के लिए अपनी आत्मा कि आवाज सुनो और आगे बढ़ो ...!!!...बुजुर्गो कि तो वे ही जाने पर आजकल लोग बड़े स्मार्ट हो गए है ..अपने -अपने मन की करने के बाद उब कर बच निकलने के लिए आत्मा की आवाज नमक पतली गली से सरक निकलते है ...???..अब देखो न अभी झारखंड राज्यसभा चुनावो में आत्मा की आवाज ने बड़े -बडो की बोलती बंद कर दी ....यही आवाज आजकल जोर से बोल रही है ..खामोश ..!!!...वैसे हमारे यहाँ आम चुनावो में भाई लोग भले ही चुनाव चिन्हों पर वोट मांगते हो पर अप्रतक्ष्य वोटिंग के समय विक्रम -वेताल की माफिक आत्माओं का आह्वान सुरु हो जाता है...????
                                                                 आह्वान की आहुति में हव्य के रूप में नाना प्रकार के द्रव्यों के दिव्य दर्शन भाई लोग बड़े चाव से न केवल करते है बल्कि भोग भी लगाते है ..????..कुछ भोगियों को माननीय अदालतों की कृपा से हम सब ने देखा भी है ...पर आत्मा तो सब को देख रही है ..!!!...आत्मा परमात्मा जेसे दार्शनिक विषय को लेकर चालू चकमक की कल्पना तो बिचारे प्राचीन मीमांसकों ने भी नहीं की होगी वरना  द्वैतवाद- अदेवतवाद -स्याद्वाद के झगडे ही नही होते ..???..यदि ये यज्ञाचार्य प्राचीन काल में प्रकट होते तो अश्वमेघ यज्ञ इत्यादी को अंतरात्मा की आवाज पर चुटकियो में ही निपटा देते ..!!! ...मित्रों निपटाने की प्रक्रिया में कही आत्मा की आड़ में अंतरात्मा ही न निपट जाए ....!!!.. दोस्तों निपटा -निपटी का समुद्र मंथन विकट है ..पर दूर नहीं है ...घुघट के पट खोल रे तो को पिया मिलेंगे...२१ जुलाई तक राज... राज..रहेगा क्या ..????

Sunday, July 1, 2012

अपना घर -अपने लोग


     मित्रों ..प्रिय साथी भाई राकेश कोरव ने महाभारतकालीन भारत वर्ष के नक्शे की यह तस्वीर भेज कर एक बार फिर हमारी गौरवमयी गाथा को ताजा तरीन कर दिया है ..!!..गौर से देखिये हम कहा-से कहा आ गए .....अपने लोग कहा  है ...!!!.उतर-पश्चिमी सीमांत क्षेत्र  में तालिबानियों ने संगीतकारों को कुचलने की मुहीम में औरंगजेब को भी मात दे दी है ...बेटियों को स्कूल जाने की मनाही कर दी गई है ..???...थोड़ासा अंदर की ओर आइये.... क्वेटा-पेशावर...चारो तरफ  ड्रोन हमलों -फिदायीन मार का तांडव मचा हुआ है ...???..सिंध में बलात धर्मान्तरण -अपहरण की कराह सुनाई दे रही है ...???..नीचे करांची में  मुहाजिरों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही है ...???...वतन की मिटटी की महक कभी मुसर्रफ को दिल्ली लाती  है ..कभी विदेश मंत्री हिना को अपने जाट पूर्वजों के गांव बुलाती है ...तो हमारे दिलीप कुमार ...गुजराल साहब .. ..को भी पूर्वजों की  पाक गलियों की खुसबू आती है ...???...याद सिर्फ चुनिन्दा  नामचीन शख्सियतों भर को नहीं आती ..ऐसे तमाम वासिंदे दोनों तरफ है जो पल-पल अपने  घर -अपने लोगो को याद करते रहते है ...बस इनकी यादेँमीडिया की चकाचोंध से दूर दिल की गहराईयों में गोते लगाती रहती है ..???..इधर पूर्वी बंगाल में चटगाँव से लेकर ढांका तक उस मिटटी में गरीबी पसरी हुई है जिसे लार्ड क्लाएव और उसके गुर्गो ने अमीरी के लिए मुफीद माना था ..तस्लीमा नसरीन से लेकर ज्योति बाबू तक अपना घर -अपने लोगो को नहीं भूल पाए है ...???
                                                अपना घर -अपने लोग ..के   दर्द को न जाने कितने लोग आज भी जी रहे है ...इनका दर्द जात-पाँत -धर्म -वर्ग से दूर माटी  का दर्द है ...जहां-जहां भी ब्विदेशी साम्राज्यवादी ताकतो  ने अपने मंसूबो को पूरा करने के लिए देशों को सरहदों में बाँटा है ...वहाँ सरहदी दूरियाँ भले ही कायम हो पर अपना घर -अपने लोग की कसक दूरियाँ मिटाने बेताब है ....ये बेताबी कब तक ...????

Sunday, June 24, 2012

आग........

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          बरसों  पहले  आई  ...राजकपूर -नर्गिस की फिल्म आग को अब तक दर्शक नहीं भूले हैं..........!!!!  भला  आग को कैसे भुलाया जा सकता है ....आखिरकार चकमक का आविष्कार आपला मानुष के पहले -पहल की खोजो में से एक जो  है   ..!..वैसे आग बला  की चीज है  ..दूर जाओ तो चैन नहीं ..पास रखो तो खैर नहीं ..लेकिन खैरियत आग बिना भी नहीं है ..! शोकीन लोग तो बीडी -सिगरेट में आग सुलगाने से खेरियत जानने की रस्म सुरु करते है ..तो कुछ टंटे निपट|ने के लिए  स्वाहा आदि के लिए अग्नि शरणम गच्छामि उवाच करते है ,,!!!!...हॉल ही की.. अथ मुम्बई-दिल्ली वी.आई.पी .स्थली आग गाथा ...चेनलो में बरसी हुई है ...परन्तु लाक्षागृह की प्रथा तो महाभारतकालीन से प्रचलित  है ..हां ये दीगर बात है की आजादी के बाद से बहुतेरी  सासूजी-ननद जी को आग से बड़ी आत्मीयता व्याप्त हुई है ..जिसका प्रकटीकरण  उनकी ही जगह माँ -वहनो को  झुलसाता रहता है ..!!....अपने यहाँ यह प्राकट्य चूल्हे -स्टोव -लालटेन आदि से सिर्फ वधूओं के पल्लू से ही  होता है     ..???                                                                                                                                                                                                                                                       आग के पल्लू का दूसरा पहलु भी किचिन से जुडा हुआ है ..महगाई  डायन की आग चुल्हों को  ठंडा कर रही है ....लकड़ी की आग जंगलो को सिमटा रही है तो पेट की आग सबको नतमस्तक किये हुए है ...जहाँ देखो आग ही आग ....???? ...ये आग कहा ले जायेगी ....????                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                

Wednesday, June 13, 2012

बाईसवीं-देवउठनी ग्यारस

हमारे पूर्वजोँ ने हिन्दुस्तानी संस्कृति में सर्व -धर्म समभाव की समरसता का जो सन्देश दिया है ...उसका जीता जागता उदहारण है आज आज मनाया जाने वाला त्यौहार -बाइसवी..!!!..आज से  सभी तीज-त्योहारों के द्वार वैसे ही खुल जांयेंगे जैसे देवउठनी ग्यारस  से सनातनियो में खुलते है ..! ...अकेला यही त्यौहार क्यों सबेरात  के मोको पर वैसे ही पुरखो को दावत दी जाती है जेसे श्राद्ध में पितरो को तर्पण दिया जाता है ....!!!
                                                             त्यौहार ही क्यों ...आप कश्मीर चले जाईये  ...धर  उपनाम को  दर से पुकारा जाता है ...मालिक ..मलिक हो गए ....सेठ ..शेख..बन  गए ...चलिए पाकिस्तान भी चलते है ...विदेश सचिव मोहतरमा सेठी ही उपनाम लिखती है ...विदेश मंत्री जी  भारत आकर अपने जाट पुरखो याद  करना नहीं भूली ....???...आखिर अपने पुरखो को कौन भूल सकता है ...???..भूलना भी नहीं चाहिए ....देस -काल की तत्कालीन परस्थितियों के चलते हमारे अपनों ने पूजन - पद्धति भले ही बदल ली हो लेकिन रीति-नीति में कोई खास बदलाव आज भी नहीं आया और आएगा भी नहीं ..आखिर खून तो इसी माटी का है न....!!!...
  हिंदुस्तान की  इस  माटी  की  इसी  जीवन पद्धति के चलते  ही  हिंदू धर्म  नहीं  बल्कि जीवन   पद्धति  है ....दरसल हिंदू धर्म नहीं ...हिंदुस्तानियों की जीवन शेली है ....!!!...इस मर्म को सबको समझते हुए ..आपस में  बातचीत जरुर करना चाहिए ...मेलजोल -समरसता को सिर्फ किसी त्यौहार या चुनिन्दा  व्यक्तियों के भरोसे न छोड़ते हुए .. जनता -जनार्दन को आगे आना चाहिए ..और  जनता आगे आ भी रही  है...यही   सच्ची देशभक्ति भी  है ...और इंसानियत का तकाजा भी ....!!! 

Monday, May 28, 2012

वीर सावरकर

























































आज से कोई तेइस साल पहले फरवरी १९८९ में साप्ताहिक हिन्दुस्तान की म.प्र.चुनाव पर मेरी कवर स्टोरी की प्रति लेकर मैं  नई दुनिया इंदौर में उपसम्पादक भर्ती का साक्षात्कार देने कक्ष में इठलाते हुए दाखिल हुआ ....मै लिखित परीक्षा पर आदरणीय श्री अभय छजलानी जी से चर्चा कर ही रहा  था कि श्रद्धेय श्री राहुल बारपुते जी का गँभीर प्रश्न आया -भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में दो आजन्म कारावास की कैद किस महापुरुष ने खुशी-खुशी सही  थी ..????.....चुनावी राजनीति पर कवर स्टोरी छपवा कर  मेरी ज्ञान बघारती बोलती बंद देख राहुल जी बोले -समकालीन जानकारी का धरातल  वीर सावरकर जैसे स्वतंत्रतासंग्रामी की ऐसी आहुतियो के ज्ञान के बिना  अधूरा है ..!!! ...वीर सावरकर की इसी वीरता के कारन उन्हें श्रद्धा के साथ वीर उपाधि से याद किया जाता है ...!!... उनकी वीरता के प्रति जानकारी का अधुरापन हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के अमर व्यक्तित्वो के प्रति विलायती  या लाल किताबें पढ़े वर्ग के उस  षण्यंत्र  का परिणाम है जिसके तहत राष्ट्रीयता की भावना को अरसे से रोकने का असफल दुष्चक्र चलाया  जा रहा है ...जिससे भारत माता की जय की जगह लाल सलाम या डालर मेरी जान के जयकारे लगे ...!!!
                                           ये सारे जयकारे ..वीर सावरकर की  वीर गाथाओं के सामने टिक नहीं सकते ...इसलिए हमारा परम कर्त्तव्य है कि हम अपनी पीढ़ी को उनकी वीरताओ से भी अवगत कराये ...यदि हम फिर भी.. ट्विंकल -ट्विंकल लिटिल स्टार ...में ही डूबे रहे तो आगे चुल्लू भर पानी भी नसीब नहीं होगा ...????



                  


















Sunday, May 27, 2012

ऋण कृत्वा तेलम पिवेत

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     
 मित्रो, बड़ी पुरानी कहावत है.... तेल देखो -तेल की धार देखो  ...समय की धारा में  कितना भी तेल क्यों न बह गया हो ..पर कहावत बरकरार है ..इसलिए तो कहावत है ..!!!...प्राचीनतम काल में तेल भरी नाव में मुर्दों  को सुरक्षित रखा जाता था ..अब तेल के खेल में जिन्दा ...मुर्दे हुए जा रहे है ...खबरिया चैनल ..मारडाला  चैनल  बन गए है ...????...क्या आपको याद आ रहा है किसी चैनल ने मारडाला से इतर इस  मझदार में  वैकल्पिक राह तलाशने की बहस या सौर उर्जा -साइकिल सवारी जैसे वैकल्पिक उपायों के   चुनाव के एस.एम्.एस.न्योते  हो ....???
                                                            दरसल  तेल मालिश के शोकिनों को न्योतने की  होड में हम ये क्यों भूल गए कि तेल हमारी दुखती रग है और आगे भी रहेगी ..क्योंकि हम.. ऋण कृत्वा तेलम पिवेत की कालिदासी  धुन में ही मस्त है ...????...बढ़ी कीमतों के बहाने ही सही पर वैकल्पिक उपायों पर  चिंता जरुरी है ...बहसे इन उपायों पर केंद्रित होनी चाहिए..न की विलापो पर ....!!!! तेल की चिंता सिर्फ मंहगाई के कारन नहीं वरन राष्ट्रीय स्वाभिमान के कारन ज्यादा जरुरी है ...यह तेल ही है जो हमें अरब देशों के संदर्भ में  हमे  हिचकियाँ ला देता है ...!!!    आज तेल पर अरब देशों पर हमारी  निर्भरता के नुकसानों के प्रति जनता -जनार्दन को जगाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए न की मार डाला का रुदन  वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा ....!!!!..जन-मन को चुनावी वैतरणी का तिनका न बनाये ..     अरब  वेसाखियो  को तजने का  राष्ट्रीय तराना बनाए ....   यही सच्ची  टी.आर.पी.  होगी ..!!!